Friday, March 8, 2019

उपाधियाँ तत्व की

उपाधियाँ तत्व की
एष सर्वेश्वर सर्वज्ञ एषोन्तर्याम्येष:।
योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययोहि भूतानाम्‌।। ६।।
अर्थात्‌ :-यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है और समस्त जीवों की उत्पत्ति तथा लय का स्थान होने के कारण यह सबका कारण है। 
एक आदमी समुद्र किनारे पहुँचा। उसने एक ग्लास को समुद्र के पानी से भर लिया। किसी ने पूछा यह क्या कर रहे हो? उसने कहा मैंने ग्लास में समुद्र भर लिया। लोग हँसने लगे, मै वहाँ होता तो मैं भी हँसी नहीं रोक पाता। फिर वह कहने लगा उसने समुद्र अर्थात् बहुत से पानी में से थोड़ा पानी ग्लास में भर लिया। पानी ही तो समुद्र है। बड़े समुद्र में से एक अंश निकाला तो ग्लास में भी छोटा ही सही पर है तो समुद्र ही। उसका ग्लास बड़ा करामाती लगा। शायद उसमें इसी तरह कुआ, नदी, तालाब भर लेने की क्षमता होगी। उसने कहा मैं इसमें कहीं से भी भरूँ हर बार पानी ही भरूंगा। फिर उसने कहा पानी कोई सा भी है आया उस समुद्र से ही है। स्थान बदलने से उसकी संज्ञा बदलती गई है। ये उसी असीम सागर की विभिन्न अवस्था जन्य संज्ञाएँ हैं। समुद्र, नदी, तालाब, झरने जो भी हो; पर हैं सब जल ही। तात्विक रूप से सब जगह वही "जल" है। अलग अलग जगह से भरा हुआ जल तो जल ही है।
"ॐ" उस असीम परमात्मा का वाचक नाम है। जो अनाम है, अरूप है, अनन्त है उसकी बात करने के लिए वाचक "ॐ" उपयोग किया गया है। वही ब्रह्म है। माण्डूक्य उपनिषद् की कारिका का प्रथम मन्त्र इस प्रकार है:-
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः। घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः।।१।।
विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ ( प्रज्ञानघन ) है। इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है। आत्मा तीनो स्थानों में अवस्थानुरूप अलग अलग, तत्व रूप से एक ही और स्थान अलग अलग होने से असंग कहलाता है।
जिस प्रकार भेद रूप से समुद्र का जल अलग अलग अवस्था में अर्थात् असंग है पर है तो वह तात्विक रूप से जल ही। उसी प्रकार विश्व, तैजस और प्राज्ञ भी भेद रूप से भिन्न परन्तु है वह उस ओंकार के पाद ही।

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