माण्डूक्य उपनिषद् कारिका अद्वैत खण्ड मन्त्र ११:-
रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ३/११ ॥
...आकाशवद् परमात्मा ही उनके आत्मा जीव रूप से प्रकाशित किया गया है।
वहीं कारिका के ४/६८ से कुछ और लगता है।
यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४/६८ ॥
जिस प्रकार स्वप्नमय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
एक जिज्ञासा है कि - क्या स्वप्नमय जीव ३/११ में कहे जीव से भिन्न है? उसका आगम और पर्यवसान है?
आगे चतुर्थ खण्ड में यह भी कहा गया है:-
यथा मायामयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४ /६९ ॥
अर्थात् जिस प्रकार मायामय जीव उत्पन्न होता भी है, वैसे ही वह मरता भी है। उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
तैत्तरीय उपनिषद् २/१ कहता है-
ब्रम्ह सत्य ज्ञान स्वरूप और अनन्त है। जो परम विशुद्ध आकाश में ही रहते हुए भी प्राणियों के हृदय रूप गुफा में छिपे हुए ब्रह्म हैं उसको जो जानता है वह विज्ञान स्वरूप ब्रह्म के साथ समस्त भोगों का अनुभव करता है। और आगे आता है-
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: शंभूतः।
निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मा से सर्व प्रथम आकाश तत्व उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल तत्व से पृथ्वी तत्व उत्पन्न हुआ। पृथ्वी से समस्त औषधियां, औषधियों से अन्न, अन्न से ही यह मनुष्य शरीर उत्पन्न हुआ। इसलिए यह शरीर अन्न रस मय है।
इससे स्पष्ट है कि तैत्तरीय श्रुति में जिन रसादि कोषों की व्याख्या की गई है आकाशवत् परमात्मा ही उनकी आत्मा जीवन रुप से प्रकाशित हुआ है।
इसे कुछ इस तरह समझें। बीज में एक पूरा का पूरा वृक्ष जड़, तना, शाखा, पत्तियों फूलों- फलों सहित छुपा हुआ है। ऐसा परोक्ष रूप से सही है। बीज की यात्रा वृक्ष की ओर होती है तब एक अव्यक्त, (प्रकृति) जिसे माया भी कहा गया है, उसके साथ चलती है जो उसे बीज से वृक्ष के रुप में रूपायित करती है। यदि बीज अपने आप में सक्षम होता तो वह स्वयं अपने आपको वृक्ष बना लेता लेकिन उस निर्जीव से जीवित वृक्ष के रुपायतन में सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो जन्म होना वृक्ष का लग रहा है परन्तु वह जो अव्यक्त वहाँ पहले से ही मौजूद थी और तब अव्यक्त वह जीव वृक्ष के साथ व्यक्त हुअा है और हम कह बैठते हैं कि वृक्ष उत्पन्न हुआ है। वस्तुतः तो जो अजन्मा था वह अजन्मा ही रहा। जिस बीज रूपी भौतिक पदार्थ में जीवन संचरित हुआ वह वृक्ष की उम्र पूरी होने पर उसमें जो व्यक्त हुआ था वह पुनः अव्यक्त हो गया। इसका अर्थ लगता यही है कि वृक्ष पैदा हुआ फिर मर गया हमने उसी के साथ यह भी समझ लिया कि जो व्यक्त था वह मर गया। अपितु वृक्ष जीवन के साथ जो जीव चला वह तो अजन्मा ही था। इसलिये प्रकट में कहा यह जाता है कि उसमें जो जीव था वह मर गया।
यहाँ तीन चीजें महत्वपूर्ण है एक तो यह कि जो उत्पन्न हुआ वह विकार है याने परिवर्तन के दौर से गुजरा है इसलिए जन्म और मृत्यु का घटित होना जान पड़ा। विकार केवल अनित्य में ही होता है। दूसरा यह कि वह जो अजन्मा वृक्ष के सम्पूर्ण जीवन में व्यक्त होता हुआ साथ प्रतीत होता रहा। वह भी वृक्ष के संग जीवित था। लेकिन कारिका का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:-
यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४/६८ ॥
स्वप्नमय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
उपरोक्त उदाहरण में हमें समझ में आ सकता है कि वृक्ष जो जीवित लगता है वह अनित्य है, या कहें कि वह स्वप्न है, इसमें जीव जन्मता और मरता लगता है पर वैसा नहीं है। वास्तव में वह तो जन्मा ही नहीं था। इसलिए हमें तो वृक्ष का जीना - मरना, जीव का जीना- मरना लगा।
अगले मन्त्र में यह दुविधा समाप्त हो जाती है।
न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥ ४/७१ ॥
तात्पर्य यह है कि कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्म की संभावना ही नहीं है। उत्तम सत्य तो यही है कि यहाँ किसी जीव की उत्पत्ति ही नहीं होती।
उक्त रूपक से (तीसरा) यह साफ लगता है कि अव्यक्त को व्यक्त होने का जो आश्रय वृक्ष है उसकी आवश्यकता हुई। चूँकि हमें तो आश्रय ही दिखाई दिया तो हमने समस्त घटना क्रम को जैसे तो तैसा समझ लिया कि वृक्ष जो जीव था वह उत्पन्न हुआ और मर गया। परन्तु जीव न तो मरता है अौर न जन्म ही लेता है।
गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि-
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।२/२८।।
हे भारत समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है।
अव्यक्त यानी न दीखना पर दिखाई देना ही जिनकी आदि है अर्थात् जन्मसे पहले भी ये थे पर सब अदृश्य थे। उत्पन्न होकर मरण से पहले तक; बीच में व्यक्त हैं, दृश्य हैं। और पुनः अव्यक्तनिधन हैं अदृश्य होना ही जिनका निधन यानी मरण है उनको अव्यक्तनिधन कहते हैं अभिप्राय यह कि मरनेके बाद भी ये सब अदृश्य हो ही जाते हैं। वस्तुतः "ममैवांशो जीव लोके" यह जीव वास्तव में न तो पैदा होता है और न ही इसका पर्यवसान है, यही परम सत्य है।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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