तुम्हें जंजीरें पसंद है, हथकड़ियाँ पसन्द है और बेड़ियाँ भी पसन्द है। इनसे प्रेम करते हो तो तुम्हें मुक्त कोई नहीं कर सकता। शायद जानते ही नहीं हो कि वह कोई और जेलर नहीं है जो यह तुम्हें पहना गया है। यह तुम्हारी अपनी बनाई और पहनी हुई है। ये जंजीरें आदि सब तुम्हारे मन ने तैयार की है और उसी ने पहनाई है इसीलिए ये तुम्हे बहुत पसन्द भी है।
तुम्हारे बचपन में यह कुछ नहीं था। कोरे कागज़ की तरह थे। मन मान्यताएँ लिखता चला गया, संस्कार ओढ़ता चला गया, व्यवहार बोता चला गया, अच्छे बुरे कर्मों की फसल लहलहाती रही। हर साल नई, दर साल वही। पुरानी बनी रही, नई जुड़ती गई। विकल्प कई आये, संकल्प कई, हुए कुछ हारे, कुछ जीते। गर्त मिले, शिखर भी छुए। ठहरा नही मन, भरा नहीं मन। तुम अपने इसी अहंभाव में जीते चले जा रहे हो। बहते रहे हो नदी की धार में बहते तिनके की तरह। न मोड़ों पर रुके न भँवर में चुके। कुछ ख़ुद ने किया और बाकी नैसर्गिक रूप से होता चला गया।
जगत की जमीन
ऊसर नहीं है मित्र!
बोया सो उगा,
फला सो चुगा।
महज एकांगी
जीवन का पथ
लौट नहीं पायेगा
समय का गजरथ।
ऐसे में,
करेगा कौन मुक्त?
कोई और नहीं
केवल अपना मन
हाँ! केवल मन
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