Sunday, August 11, 2019

कबीर का फक्कड़ाना

कबीर जुलाहे थे। उनकी साखी, सबद, रमैनी, दोहे आदि सभी साहित्य चादर बुनते बुनते रचे और गाये गये हैं। वे किसी वनप्रान्तर में नही गए, न धूनी रमाई न जप-तप किया न ही किसी आश्रम में जा कर बैठे। धुनके की ताँत में वहाँ अध्यात्म के स्वर थे, तानों बानों में जीवन की बुनाई थी। वे चलते चरखों और  रंगरेजों के बीच बने रहे यहाँ तक कि कुछ किंवदंतियों के अनुसार वे वेश्याओं से सीधे संवाद से भी नहीं हिचके क्योंकि उनके स्वभाव में निर्मलता और निश्छलता भी। संक्षेप में कहें तो वे संसार से पलायन के पक्षधर नही थे। जैसे कमल का सौन्दर्य अम्लान होता है और कीचड़ मे पैर जमाए खड़ा रहता है। जो जगत झंझटों से, आपदाओं से भरा है, माया के इन्द्रजाल से चौंधियाता है वही हमारे जीवन का पोषक भी है। इसमें रह कर निर्लिप्त कैसे रहें, मुक्त कैसे होवें इसका फक्कड़ाना स्टाइल जनमानस की सामान्य भाषा शैली में कहने वाला केवल कबीर था। सिद्धान्तों का उपदेश अलग बात है पर उसको जीना अलग बात है। एक हाथ में जगत और दूसरे में जगदीश कबीर के दर्शन की मुख्य धारा थी। मैं ऐसा सोचता हूँ।

रामनारायण सोनी

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