टूटी सब मदहोशियाँ स्वप्नों की झंकार ।
हम जो जागे नींद से जागी अन्तर्धार ।
डॉ जय वैरागी
जागा कौन है और कौन है सोया?
क्या जागे हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो सोया नहीं है अथवा जिसे नींद नहीं आई हो? अथवा जिसके स्वप्न टूट गये हों? क्या सोए हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो जाग नहीं रहा है?
असल में "जागना" वर्तमान में रहना है। जागा हुआ केवल वह है जो केवल वर्तमान में चल रहे समग्र घटना क्रम का मात्र एक दृष्टा है। जागा वह है जो व्यर्थ की उलझनों की भूल भुलैया से बाहर है जो भविष्य के अंधेरे कुएँ में सुई जैसी को चीज़ ढूँढने में व्यस्त न हो। जो जागा हुआ है वह मूर्छा से बाहर है। जो जागा है वह भीतर से बाहर देखता है, अपनी अन्तर्दृष्टि से देखता है। जो अन्दर भी होश में है और बाहर भी होश में है, जिसकी मूर्छा पूरी तरह टूट गई है वही जागा है।
नींद से बाहर होना और मूर्च्छा से बाहर होना अलग अलग है। जागते हुए वर्तमान में न होना मूर्छा है जबकि सोते में मूर्छा नहीं हो सकती। लेकिन वास्तविक जागरण तो अपनी चेतना की अन्तर्धारा का स्फूर्त होना है। अन्तर्धारा के मूल में अन्तश्चेतना का वैभव सन्निहित है।
दो पंक्तियों मे औपनिषदेय चिन्तन की झलक मिलती है।
*अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते*
*अजन्मनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा .. १३..*
साधुवाद
रामनारायण सोनी
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