आत्मप्रबोधिनी १४
ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचि जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।
क्या तुमने कभी किसी फूल के परागकणों को तितलियों का आह्वान करते देखा है? क्या तुमने मन्दिर के शिखर पर उस ध्वज को हवा के परों पर थिरकते देखा है? क्या तुमने गुनगुन करती मधुपरियों के शिल्प में विश्वकर्मा के सृजन का आभास किया है? क्या तुमने कभी दीवार पर चढ़ती चीटियों के पदचाप में कर्मवीरा की आहट सुनी है? क्या रुई जैसे हलके फुलके उड़ते फिरते बादलों को हजारों मील चल कर लाखों टन पानी ढोते देखा है? और फिर इन्हीं बादलों को सिंहनाद करते हुए पर्वतों, नगरों, वनस्पतियों का अभिषेक करते देखा है? क्या कभी किसी बीज के गर्भ से सफेद झक्क अंकुरण को झाँकते देखा है? क्या तुम जानते हो कि पानी में शीतलता क्यों है और वह सबसे निचला तल ढूँढता क्यों है? अग्नि जलाती क्यों है? धरती, आकाश, अगन, पवन, पानी जैसे तत्व सख्ती से अनुशासन में रह कर अपने अपने धर्म का पालन क्यों करते हैं? प्रकृति के अधिकतर व्यवहार में हम कैसे होता है यह तो जानते हैं पर यह नहीं जानते कि इन नियमों को बना कर उनको पालन कौन करवाता है?
हाँ ये सारी क्रियाएँ और कर्म केवल संकेत मात्र के लिये गिनवाए गये हैं जबकि प्रकृति का अणु-अणु ऐसा ही कुछ न कुछ हर घड़ी हर पल कर रहा है। न तुमने कभी ध्यान से देखा, न तुम्हारे कान इन्हें सुन पाये, न ही तुम कोई संवेदना ही जागी हम पर इनके द्वारा किये गए अनन्त उपकारों के प्रति। ये सब करते हुए भी कभी थके नहीं, रुके नहीं, झुके नहीं।
देखो! तुम बस दाैड़ रहे हो पर इस दौड़ में वे अनमोल पल छोड़ रहे हो। प्रकृति गा रही है, नाच रही है, तप रही है, खप रही है फिर भी हम सब के लिये विपुल आहार तैयार कर रही है, खेतों में, खलिहानों में, उपवनों में, चौगानों में। कोई तो है जो जानता है तुम्हारी भूख को, तुम्हारी प्यास को और शायद तुम्हारी हर छोटी बड़ी सभी जरूरतों को।
बस जरूर महसूस करें कि प्रकृति माँ के, परमपिता परमेश्वर के इस उपकार को और हम उनके कृतज्ञ होवें।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।9/10।।
रामनारायण सोनी
१५.०६.२२
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