लोग कहते हैं पहला प्यार ही प्यार है और वही आखिरी प्यार होता है। मैं कहता हूँ जो प्यार वास्तव में पहला होता है वह आखिरी हो ही नहीं सकता क्योंकि आखिरी शब्द प्यार में पूर्णतः वर्जित है। प्यार की दुनिया में एन्ट्री तो है, फिर उसका असीम विस्तार है तो फिर अन्त कैसे हो सकता है?
दुनिया में ऐसा प्यार कभी नहीं देखा है- न कहानियों में और न सच के धरातल पर जो आँसुओं से नम न हुआ हो। कभी उफनते जज़्बातों में, कभी मिलने की खुशी में तो कभी न मिलने के गम में नयनों से बहने लगता है। यह पक्का है कि प्यार भरे दिलों की जुबान लफ्जों और हर्फों से नहीं बनती इसलिये यह सिर्फ सुन कर नहीं पढ़ी जा सकती वरन् महसूस भर की जाती है। प्यार सच्चा अथवा झूठा नहीं होता क्योंकि वह अपरिभाषेय है, न वह अधूरा होता है न पूरा क्योंकि वह निरन्तर होता है। प्यार एक पराभौतिक सत्ता है जो हृदय के अन्तर्प्रदेश में विराजती है इसलिये प्रेम बहिरंग नहीं अन्तरंग चेतना है।
प्रेम एक किस्म की पूर्णता है। जिसने कभी प्रेम नहीं किया वह अपूर्ण है, जीवन भर अपूर्ण रहता है, अधूरा ही रहता है। प्यार में केवल समर्पण है, ऐसा होते ही देही विदेह हो जाता है। अलग-अलग की पहचान खोते ही दो अधूरे एक साथ मिल कर "एक पूर्ण" हो जाता है।
यह मायने नहीं रखता कि जिन्दगी जी जाना ही जीवन है बल्कि उसे पूर्ण करने के लिये जिन्दगी में प्यार का उपलब्ध हो जाना अत्यावश्यक है। "एव्हरी थिंग इज फेयर इन लव एण्ड वार" किसी वहशी सिरफिरे का कथन है। प्यार में मिटाना नहीं, मिटना जरूरी है। जिसने प्यार नहीं किया वह जल में प्यासी रहने वाली मछली की तरह है। जो प्यार के अवगुण्ठन से बाहर निकल आया समझो प्यार नहीं कुछ और ही था।
प्यार जीवमात्र का नैसर्गिक गुण भी है और अभिन्न अंग भी है शायद इसीलिये प्यार किया नही जाता, हो जाता है।। स्वतः।।
रामनारायण सोनी
६.६.२२
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