Tuesday, July 26, 2022

तावीज में पल

जानते होगे शायद अब भी तुम

मिले थे जब अचानक हम!
उतार कर रख ली थी
अपनी अपनी घडियाँ जेबों में
रोकने के लिये सरपट दौड़ते वक्त को
पर रुका नहीं वह
फिर जो लगा था वह
हमें फिर नहीं लगा कभी भी
गुजर गई थी सदियाँ
उस एक पल में
जिये थे हम उस एक पल में
एक पूरी की पूरी जिन्दगी!
तुम्हें याद हो के न याद हो!
उम्र के तावीज में,
मैं उसे गले में बाँध कर घूमता रहता हूँ
यकबयक इसे चूमता रहता हूँ 
जैसे कि यहीं हो तुम

रामनारायण सोनी
२६.०७.२२

No comments:

Post a Comment

लौट आओ चाँद मेरे!

लौट आओ चाँद मेरे! सुनो तुम भी ! मेरा चाँद अब नक्षत्र हो गया है। वह पहले भी मेरी धरती की रात में दिखता था और अब भी।  चाँद शायद यह सोचता होगा ...